
महिलाकुलसंवासं पदिं सुदं मादरं च पिदरं च ।
विसयंधा अगणंते दुक्खसमुद्दम्मि पाडेइ॥944॥
पति मात-पिता अरु सुत कुल को दुःखसागर में देती डाल ।
विषयों से अन्धी स्त्री करती न किसी की भी परवाह॥944॥
अन्वयार्थ : विषयों में अंध जो स्त्री वह अपने कुल को नहीं गिनती/देखती कि 'मैं किस कुल में उपजी हूँ? कुमार्ग में चलँूगी तो सारा कुल कलंकित हो जायेगा - ऐसा विचार नहीं करती है ।' सहवासी कुटुम्बीजन की अवज्ञा होगी, उसे भी नहीं गिनती । मेरे पति की जगत में बहुत बडी प्रतिष्ठा है, मैं कुमार्ग पर चलूँगी तो मेरे पति की प्रतिष्ठा बिगड जायेगी - ऐसा विचार नहीं करती । मेरा पुत्र महा ऐश्वर्यवान है, सारे लोक में मान्य है - पूज्य है । यदि मैं अकृत्य करूँगी तो मेरा पुत्र महंत पुरुषों में कैसे मुख दिखायेगा? ऐसे अनर्थ में भी शंका नहीं करती । मेरी माता तथा पिता लज्जित हो काले मुख होकर हृदय में अति दग्ध होकर आर्तध्यान से मरण करेंगे । मेरे निंद्यकर्म करने से सारे कुटुम्ब को संताप उपजेगा । व्यभिचारिणी दुष्टा स्त्री ऐसा विचार नहीं करती, सारे कुटुम्ब को दु:ख के समुद्र में पटकती है ।
सदासुखदासजी