
महिलासु णत्थि वीसंभपणयपरिचयकदण्णदा णेहो ।
लहुमेव परगयमणाओ ताओ सकुलंपि य जहंति॥949॥
नहीं स्नेह विश्वास कृतज्ञता परिचय होता नारी में ।
पर-गत चित होने पर सहसा अपना कुल अरु पति तजें॥949॥
अन्वयार्थ : स्त्रियों में विश्वास, प्रीति, परिचय, कृतज्ञता/किये गये उपकार को नहीं भूलना तथा स्नेह - ये नहीं होते । जिसका पर-पुरुष में चित्त लग जाने के बाद विश्वास नहीं रहता, परिचय नहीं रहता, किये हुए उपकार लोप देती है, स्नेह भंग कर देती है तथा अपना कुशल/भला होना, उसका भी शीघ्र ही त्याग कर देती है ।
सदासुखदासजी