
अदिलहुयगे वि दोसे कदम्मि सुकदस्सहस्समगणंती ।
पइ अप्पाणं च कुलं धणं च णासंति महिलाओ ॥951॥
थोड़ा-सा भी हो अपराध भुला देती शत-शत उपकार ।
नारी कर देती है अपना, पति का, कुल अरु धन का नाश॥951॥
अन्वयार्थ : अति अल्प दोष होते ही हजारों उपकार को नहीं गिनती । यह स्त्री अपने पति को मार डालती है,स्वयं भी मर जाती है, कुल का नाश करती है एवं धन का नाश करती है ।
सदासुखदासजी