आसीविसो व्व कुविदा ताओ दूरेण णिहदपावाओ ।
रुट्ठो चंडो रायाव ताओ कुव्वंति कुलघादं॥952॥
क्रुद्ध सर्प की तरह दूर से त्याग करो तुम नारी का ।
रुष्ट प्रचण्ड नृपतिवत् जो करती विनाश है निज कुल का॥952॥
अन्वयार्थ : यह दुष्ट स्त्री कैसी है? क्रोध को प्राप्त हुआ आशीविष जाति के सर्पसमान आत्मा को दूर से ही नष्ट कर देती है ओैर रोष को प्राप्त हुए क्रोधी राजा के समान कुल का घात करती है ।

  सदासुखदासजी