
सक्कारं उवकारं गुणं व सुहलालणं च णेहो वा ।
मधुरवयणं च महिला परगदहिदया ण चिंतेइ॥954॥
जो पर-पुरुषों में रत रहती पति का किया हुआ उपकार ।
स्नेह, रूप, कुल गुण यौवन लालन पालन का नहीं विचार॥954॥
अन्वयार्थ : व्यभिचारिणी स्त्री की ऐसी रीति होती है कि उसका पति बहुत सम्मान/सत्कार करे तथा वस्त्र, आभरण, धन, भोजन, दान देकर बहुत उपकार करता है । स्वयं का पति कुलवान हो, रूपवान हो, यौवनवान हो, शीलवान, विनयवान, गुणवान हो तथा अपने को सुखरूप लाड करता हो, आप में/पत्नी में बहुत स्नेह करता हो, मिष्ट वचन बोलता हो, अपने पति के इतने गुणों का चिंतवन नहीं करती/ देखती और पर-पुरुष में रक्त ऐसी स्त्री इतने गुणों के धारक, इतना उपकार करने वाले अपने पति को भी मारना ही चाहती और मार ही डालती है, इसमें संशय नहीं ।
सदासुखदासजी