
वीरमदीए सूलगदचोरदट्ठोट्ठिगाए वाणियओ ।
पहदो दत्तो य तहा छिण्णो ओठ्ठोत्ति आलविदो॥957॥
सूली पर था चढ़ा चोर उससे मिलने गई वीरमती ।
काटा ओंठ चोर ने उसका किन्तु कहे वह मेरा पति॥957॥
अन्वयार्थ : शूली ऊपर चढा चोर उसने खंडन/काट दिया है ओष्ठ जिसका - ऐसी वीरमति नामक दुष्ट स्त्री, वह अपने पति/वणिक पुत्र उसे मार डाला और घोषणा की - मेरे पति ने मेरा ओष्ठ काट डाला । अत: दुष्ट स्त्री जो अनर्थ करती है, वैसा अनर्थ जगत में कोई नहीं करता है ।
सदासुखदासजी