वग्घविसचोरअग्गी जलमत्तगयकण्हसप्पसत्तूसु ।
सो वीसंभं गच्छदि वीसंभदि जो महिलियासु॥958॥
व्याघ्र चोर विष अग्नि नीर अरु कृष्ण-सर्प-शत्रु-गजराज ।
इनका जो विश्वास करे वह करे नारियों का विश्वास॥958॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष, स्त्रियों में विश्वास करता है; वह व्याघ्र में, विष में, चोर में, अग्नि में, जल में, मदोन्मत्त हस्ती में, कृष्ण सर्प में, शत्रुओं में विश्वास करता है ।

  सदासुखदासजी