पाउसकालणदीवोव्व ताओ णिच्चंपि कलुसहिदयाओ ।
धणहरणकदमदीओ चोरोव्व सकज्जगुरुयाओ॥960॥
वर्षा ऋतु की सरिता-सम नारी का चित्त सदा कलुषित ।
चोर समान स्व कार्य साधती धन हरने में रहता चित॥960॥
अन्वयार्थ : यह स्त्री कैसी है? जैसे वर्षा काल की नदी अभ्यंतर/नीचे मलिन होती है, तैसे ही इसका चित्त, राग, द्वेष, मोह, ईर्ष्या और असूया/पर के गुण नहीं देख सकना और मायाचार आदि दोषों से निरन्तर मलिन है । जैसे चोर की बुद्धि पर का धन हरने में रहती है, वैसे ही स्त्री की बुद्धि भी मधुर वचन से, रतिक्रीडा से तथा अनुकूल प्रवृत्ति से पुरुष का धन हरण करने में उद्यमी है और अपना कार्य करने में प्रधान है ।

  सदासुखदासजी