रोगो दारिद्दं वा जरा व ण उवेइ जाव पुरिसस्स ।
ताव पिओ होदि णरो कुलपुत्तीए वि महिलाए॥961॥
जब तक नहीं बुढ़ापा रोग तथा दरिद्रता का हो कोप ।
हो कुलीन नारी पर तब तक प्रिय तज पति से करती प्रेम॥961॥
अन्वयार्थ : जब तक रोग, दरिद्रता, जरा पुरुष को प्राप्त नहीं होती; तब तक ही कुल में उत्पन्न ऐसी स्त्री को पुरुष प्रिय है ।

  सदासुखदासजी