
जुण्णो व दरिद्दो वा रोगी सो चेव होइ से वेसो ।
णिप्पीलिओव्व उच्छू मालाव मिलाप गदागंधा॥962॥
वृद्ध दरिद्र तथा रोगी होने पर होता वैसा द्वेष ।
नीरस ईख गन्ध बिन माला से होता है जैसा द्वेष॥962॥
अन्वयार्थ : जिस समय अपना पति जवान था, धनवान था, नीरोग था; उस समय तो अपने को प्रिय लगता था और जब वृद्ध, दरिद्री, रोगी हो गया; तब अपना ही पति द्वेष करने योग्य अप्रिय लगता है । जैसे रस से भरा गन्ना तथा प्रफुल्लित उज्ज्वल सुगन्ध पुष्पमाला अतिराग से आदर करने योग्य होती है और जिसका रस निकाल लिया गया है - ऐसा गन्ना तथा मलिन हो गई गन्ध जिसकी, ऐसी सुगन्ध रहित माला आदर के योग्य नहीं होती; वैसे ही वृद्ध, दरिद्री तथा रोगी पुरुष स्त्रियों द्वारा आदर के योग्य नहीं होता है ।
सदासुखदासजी