मत्तो गउव्व णिच्चं पि ताउ मदविंभलाओ महिलाओ ।
दासेव सगे पुरिसे किं पि य ण गणंति महिलाओ॥965॥
मद से हों उन्मत्त नारियाँ मदोन्मत्त गजराज समान ।
दास और पति में किंचित् नहिं भेद करें वे गिनें समान॥965॥
अन्वयार्थ : मदोन्मत्त हाथी के समान रूप के मद से, यौवन के मद से, धन के मद से, वस्त्रआभ रण, शृंगार के मद से ये स्त्रियाँ जब विह्वल होती हैं, अचेत होती हैं; तब अपने दासीपुत्र में और अपने पति में किंचित् भी अन्तर नहीं समझतीं ।

  सदासुखदासजी