
अणिहुदपरगदहिदया ताओ वग्घीव दुट्ठहिदयाओ ।
पुरिसस्स ताव सत्तूव सदा पावं विचिंतंति॥966॥
पर-नर में नित चित्त रमें वे दुष्ट हृदय व्याघ्रीवत् जान ।
सदा बुरा ही चिन्तन करती वे पुरुषों का शत्रु समान॥966॥
अन्वयार्थ : जैसे व्याघ्री बिना अपराध के ही मारने के लिये दुष्ट हृदय वाली होती है, तैेसे ही पर-पुरुष में जिसका अरोक/अमर्यादित चित्त लगा है - ऐसी दुष्ट स्त्री भी बिना अपराध के ही मारने के लिये व्याघ्री के समान दुष्ट हृदया है और वह कुशील स्त्री शत्रु के समान पुरुष का अशुभ ही सदाकाल चिंतवन करती है ।
सदासुखदासजी