
संझाव णरेसु सदा ताओ हुंति खणमेत्तरागाओ ।
वादोव महिलियाणं हिदयं अदिचंचलं णिच्चं ॥967॥
पुरुषों के प्रति क्षण-भंगुर है सान्ध्य लालिमा-सम अनुराग ।
महिलाओं का हृदय सदा अति चंचल रहता वायु समान॥967॥
अन्वयार्थ : यह स्त्री, पुरुषों में सर्वकाल संध्या के राग-समान अल्पकाल राग करती है । इनका अधिक बँधा हुआ अनुराग भी एक क्षण में नष्ट हो जाता है । स्त्री का दूसरे पुरुष में चित्त/दिल लग जाये तो अपना अधिक काल का उपकारी स्नेही, उसमें अपने अधिक रागभाव को भी संध्या के राग के समान क्षणमात्र में त्याग देती है तथा पवन के समान सदा ही इसका हृदय अति चंचल है, एक पुरुष में स्थिर नहीं रहता ।
सदासुखदासजी