जावइयाइं तणाइं वीचीओ वालिगाव रोमाइं ।
लोए हवेज्ज तत्तो महिलाचिंताइं बुहगाइं॥968॥
हैं त्रिलोक में जितने तृण, सागर-लहरें बालू के कण ।
तथा रोग हैं जितने उससे अधिक नारि के मनो विकल्प॥968॥
अन्वयार्थ : लोक में जितने रोम हैं, बाल हैं, उनसे भी अधिक स्त्री के परिणामों के दुष्ट विकल्प हैं ।

  सदासुखदासजी