
आगास भूमि उदधी जल मेरू वाउणो वि परिमाणं ।
मादुं सक्का णा पुणो सक्का इत्थीण चित्ताइं॥969॥
गगन-भूमि सागर-जल मेरु और वायु का भी परिमाण ।
शक्य मापना, किन्तु नारियों के मन का हो सके न माप॥969॥
अन्वयार्थ : आकाश का, भूमि का, समुद्र के जल का, मेरु का तथा पवन का भी परिमाण किया जा सकता है, परन्तु स्त्रियों के मन के दुष्ट विकल्पों का परिमाण/नाप नहीं किया जा सकता है ।
सदासुखदासजी