
चिट्ठंति जहा ण चिरं विज्जुज्जलबुव्वुदो व उक्का वा ।
तह ण चिरं महिलाए एक्के पुरिसे हवदि पीदी॥970॥
जैसे बिजली और बुलबुला उल्का नहीं रहे बहुकाल ।
त्यों नारी की प्रीति पुरुष में कभी न रहती है बहुकाल॥970॥
अन्वयार्थ : जैसे बिजली, जल का बुदबुदा, उल्कापात अधिक समय तक नहीं रहता, तैसे ही एक पुरुष में स्त्री की प्रीति भी अधिक समय तक नहीं टिकती; स्त्री के चित्त का राग अनेक पुरुषों में गमन करता है ।
सदासुखदासजी