कुविदो व किण्हसप्पो दुट्ठो सीहो गओ मदगलो वा ।
सक्का हवेज्ज घेत्तुं ण य चित्तं दुट्ठमहिलाए॥972॥
क्रुद्ध सर्प अरु दुष्ट सिंह उन्मत्त गयंद पकड़ना शक्य ।
किन्तु दुष्ट नारी के चित को जान सकें यह सदा अशक्य॥972॥
अन्वयार्थ : क्रोध को प्राप्त हुआ कृष्ण सर्प, दुष्ट सिंह तथा मद से व्याप्त हाथी - इन्हें तो ग्रहण/ वश करने में कोई समर्थ भी है, परन्तु दुष्ट स्त्रियों का चित्त अपने वश करने में कोई समर्थ नहीं होता ।

  सदासुखदासजी