
अणुवत्तणाए गुणवयणेहि चित्तं हरंति पुरिसस्स ।
मादा व जाव ताओ रत्तं पुरिसं ण याणंति॥974॥
जब तक निजासक्त नहिं जानें जैसे बालक को माता ।
अनुवर्तन गुणवर्णन द्वारा चित्त हरें वे पुरुषों का॥974॥
अन्वयार्थ : जब तक पुरुष का चित्त अपने में आसक्त नहीं हुआ - ऐसा जानती है, तब तक तो माता के समान अनुकूल प्रवर्तन करके तथा वचनों से गुणगान करके पुरुष के चित्त को हरती है । किस-किस प्रकार से पुरुष का चित्त हरती है, यह कहते हैं-
सदासुखदासजी