पं-सदासुखदासजी
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किस-किस प्रकार से पुरुष का चित्त हरती है, यह कहते हैं-
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अलिएहिं हसियवयणेहिं अलियरुयणेहिं अलियसवहेहिं ।
पुरिसस्स चलं चित्तं हरंति कवडाओ महिलाओ॥975॥
झूठे हास्य वचन से और रुदन से झूठी शपथों से ।
पुरुषों के चंचल चित को कपटी नारी इस तरह हरें॥975॥
सदासुखदासजी