महिला पुरिसं वयणेहिं हरदि पहणदि य पावहिदएण ।
वयणे अमयं चिट्ठदि हियए य विसं महिलियाए॥976॥
वचनों से आकर्षित करतीं पाप हृदय से करती घात ।
वचनों में अमृत रहता है किन्तु हृदय में विष का वास॥976॥

  सदासुखदासजी