तो जाणिऊण रत्तं पुरिसं चम्मट्ठिमंसपरिसेसं ।
उद्दाहंति वधंति य बडिसामिसलग्गमच्छं व॥977॥
जब जानें आसक्त पुरुष में हड्डी चाम मांस ही शेष ।
मांस लोभ में फँसे मत्स्यवत् दे संताप विघात करें॥977॥
अन्वयार्थ : झूठे हास्य के वचन से, झूठे रुदन से तथा झूठी सौगन्ध से, कपट से ये स्त्रियाँ पुरुष के चंचल चित्त को हरती हैं - अपने वश करती हैं । यह स्त्री वचन से तो पुरुष के मन को हरती है और पापरूप हृदय से पुरुष को हनती-मारती है । अत: स्त्रियों के वचन में अमृत बसता है और हृदय में महान विष है । जब तक पुरुष को अपने में आसक्त हुआ नहीं जानती, तब तक तो अनुकूल प्रवर्तन तथा अत्यन्त विनयादि करके पुरुष के आधीन प्रवर्तती है और पश्चात् पुरुष को अपने में आसक्त हुआ जानकर फिर पुरुष को चाम, हाड, मांस ही का पुतला, ज्ञानरहित जानकर अपमान करती है और वडिस/लोहे का टेडा कीला, उसमें फँसे मत्स्य के समान पुरुष को बाँधती है ।

  सदासुखदासजी