पं-सदासुखदासजी
उदएपवेज्जहिसिलाअग्गीणाडहिज्जसीयलो होज्ज ।
ण य महिलाण कदाई उज्जुयभावो णरेसु हवे॥978॥
शिला तैर सकती है जल में अग्नि हो सकती शीतल ।
किन्तु मनुज के प्रति नारी का नहीं हो सके हृदय सरल॥978॥
सदासुखदासजी