
उज्जुयभावम्मि असत्तयम्मि किध होदि तासु वीसंभो ।
विस्संभम्मि असंते का होज्ज रदी महिलियासु॥979॥
सरल भाव का हो अभाव तो कैसे उनमें हो विश्वास ।
और नहीं विश्वास रहा तो कैसे रहे प्रेम का वास॥979॥
अन्वयार्थ : कदाचित् पाषाण की शिला जल में तैरने लग जाये तथा अग्नि शीतल होकर नहीं जलाये । ऐसे नहीं होने योग्य कार्य भी कदाचित् हो जायें तो भी स्त्रियों का भाव पुरुषों में कदाचित् सरल नहीं होता और जब सरलभाव नहीं हुआ, तब स्त्रियों का विश्वास कैसे हो? और विश्वास नहीं होता तो स्त्रियों में रति/प्रीति तथा आसक्ति कैसे हो?
सदासुखदासजी