
गच्छिज्ज समुद्दस्य वि पारं पुरिसो तरित्तु ओघबलो ।
मायाजलमहिलोदधिपारं ण य सक्कदे गंतुं ॥980॥
महाबली नर निज भुजबल से सागर को कर सकता पार ।
माया-जल से भरा कामिनीरूप उदधि कर सके न पार॥980॥
अन्वयार्थ : महापराक्रमी पुरुष भुजाओं से तिरकर समुद्र के पार को प्राप्त हो जाये, परन्तु मायाचार रूपी जल से भरे स्त्रीरूपी समुद्र के पार को पाने में, गमन करने में महाबलवान भी समर्थ नहीं होता ।
सदासुखदासजी