रदणाउला सवग्घाव गुहा गाहाउला च रम्मणदी ।
मधुरा रमणिज्जावि य सढा य महिला सदोसा य॥981॥
रत्नभरी सह-व्याघ्र गुफा अरु मच्छ भरी ज्यों रम्य नदी ।
मधुर और रमणीय किन्तु है कुटिला दोषयुक्त नारी॥981॥
अन्वयार्थ : जैसे रत्न सहित व्याघ्र की गुफा और ग्राह/मिष्ट जल से व्याप्त रमणीक नदी है, तैसे ही वचन से मधुर और रूप से रमणीक दिखे तो भी आपके/अपने ज्ञान से रहित महामूर्ख है, दोषों से सहित है ।

  सदासुखदासजी