वज्जदि णियडिमेव उद्देदि ।
गोधाणुलुक्कमिच्छी करेदि पुरिसस्स कुलजावि॥982॥
कोई दोष देखता उसमें तो भी वह न करे स्वीकार ।
नर का दोष लखे गोहवत् अपना हठ न करे परित्याग॥982॥
अन्वयार्थ : यह स्त्री कैसी है? बारम्बार दिखाने पर और उपदेश देने पर भी जो सत्यार्थ भाव अंगीकार नहीं करती और मायाचार छल को बिना उपदेश के स्वयमेव ही प्राप्त होती है ।

  सदासुखदासजी