पुरिसं वधमुवणेदित्ति होदि बहुगा णिरुत्तिवादम्मि ।
दोसे संघादिंदि य होदि य इत्थी मणुस्सस्स॥983॥
नारी वाचक शब्दों की निरुक्ति दोष ही प्रकट करे ।
करे पुरुष वध अतः वधू स्त्री दोष एकत्र करे॥983॥
अन्वयार्थ : निरुक्तिवाद/शब्द का अर्थ, उसका ऐसा भाव जानना - जो 'पुरुष' को वध/मरण को प्राप्त कराये; इसलिए इसे 'बन्धूक' कहते हैं और मनुष्य को दोषों में 'संघातयति'/इकट्ठा करे उसे स्त्री कहते हैं ।

  सदासुखदासजी