सूलो इव भित्तुं जे होइ पवोढुं तहा गिरिणदी वा ।
पुरिसस्स खुप्पदुं कद्दमोव मचुव्व मरिदंु जे॥993॥
शूल-समान भेदती नर को भव-समुद्र में नदी-समान ।
दलदल-सम नर उसमें डूबे और मारने मृत्यु-समान॥993॥

  सदासुखदासजी