करि ेवदारण फरसा जैसी मुद्गर वत् ताड़िि नर काि ।
नर का चूर्ण बनानि हतिु है लुहार-घनवत् जानाि॥995॥
करे विदारण फरसा जैसी मुद्गर वत् तोड़े नर को ।
नर का चूर्ण बनाने हेतु है लुहार-घनवत् जानो॥995॥
अन्वयार्थ : यह स्त्री कैसी है? पुरुष को बाँधने की पाश है, छेदने को तलवार के समान है, भेदने के लिये भाला सेल के समान है, डुबोने के लिये महान कर्दम है, भेदने को शूल है, परिणाम को बहाने के लिये पर्वत से गिरती नदी के समान है, अन्दर में पेठ/प्रवेश कर जाने को तथा चुभने/गड जाने को अन्ध कर्दम के समान है, मारने को मृत्यु के समान है, दग्ध करने को अग्नि के समान है, मूढ करने को मदिरा के समान है, चीरने को करोंत के समान है, खुजाने को खाज के समान है, काटने को फरसी के समान है, ताडना देने को मुद्गर के समान है, चूर्ण करने को पीसनी/चक्की आदि के समान है । पुरुष को ऐसे दुह्नख उत्पन्न करने वाली स्त्री है ।

  सदासुखदासजी