पं-सदासुखदासजी
एए अण्णेय बहुदोसे महिलाकदे वि चिंतयदो ।
महिलाहितो विचित्तं उव्वियदि विसग्गिसरसीहिं॥997॥
एेसे और अन्य दोषों का जो विचार नर करते हैं ।
विष अरु अग्नि-समान पुरुष वे विमुख नारि से होते हैं॥997॥
सदासुखदासजी