
जह सीलरक्खयाणं पुरिसाणं णिंदिदाओ महिलाओ ।
तह सीलरक्खयाणं महिलाणं णिंदिदा पुरिसा॥1000॥
यथा शील रक्षक पुरुषों के लिए नारियाँ निन्दा योग्य ।
वैसे शीलवती नारी के लिए पुरुष भी निन्दा योग्य॥1000॥
अन्वयार्थ : जैसे शील की रक्षा करने वाले पुरुषों को स्त्री निंदने योग्य है, तैसे ही अपने शील की रक्षा करने वाली धर्मात्मा स्त्रियों को पुरुषों का संग निंदने योग्य है । जो कुलवन्ती, शीलवन्ती, धर्मात्मा स्त्रियाँ हैं, उन्हें पुरुषों की संगति तथा कुशीलिनी स्त्रियों की संगति सर्वथा त्यागने योग्य है ।
सदासुखदासजी