किं पुण गुणसहिदाओ इच्छीओ अत्थि वित्थडजसाओ ।
णरलोगदेवदाओ देवेहिं वि वंदणिज्जाओ॥1001॥
जो गुणसहित नारियाँ हैं अरु जिनका यश त्रिलोक में व्याप्त ।
देव समान लोक में जो नर, देवों से भी वन्दन योग्य॥1001॥

  सदासुखदासजी