तित्थयर चक्कधरवासुदेवबलदेवगणधरवराणं ।
जणणीओ महिलाओ सुरणरवरेहिं महिलाओ॥1002॥
तीर्थंकर गणधर बलदेव चक्रवर्ति नारायण को ।
देती जन्म नारियाँ वे सब सुर-नर से हैं वन्दन योग्य॥1002॥
अन्वयार्थ : शीलादि गुणों से सहित और विस्तरित हुआ है यश जिनका, मध्यलोक में देवता समान, देवों द्वारा वंदनीय ऐसी स्त्री लोक में नहीं हैं क्या? अपितु हैं ही । तीर्थंकर, चक्रधर, वासुदेव, बलदेव, गणधर - इनको उत्पन्न करने वाली इनकी मातायें, देव-मनुष्यों में प्रधान, उनसे वंदनीय - ऐसी स्त्रियाँ भी जगत में होती ही हैं ।

  सदासुखदासजी