एगपदिव्वइकण्णावयाणि धारिंति कित्ति महिलाओ ।
वेधव्वतिव्वदुक्खं आजीवं णिंति काओ वि॥1003॥
कई नारियाँ एक पतिव्रत, बाल ब्रह्मचर व्रत धारें ।
कितनी ही जीवन पर्यन्त तीव्र वैधव्य दुःख भोगें॥1003॥
अन्वयार्थ : कितनी ही स्त्रियाँ एक पतिव्रत सहित अणुव्रतों को धारण करती हैं और विधवापने के कितने तीव्र दुह्नख जीव को नहीं प्राप्त होते हैं?

  सदासुखदासजी