पं-सदासुखदासजी
ओग्घेण ण वूढाओ जलंतघोरग्गिणा ण दड्ढाओ ।
सप्पेहिं सावदेहिं य परिहरिदा आवे काओ वि॥1005॥
कितनी शीलवती महिलायें जल प्रवाह से नहिं डूबी ।
घोर अग्नि में नहीं जलीं कुछ कर न सके सर्पादिक भी॥1005॥
सदासुखदासजी