
सव्वगुणसमग्गाणं साहूणं पुरिसपवरसीहाणं ।
चरमाणं जणणित्तं पत्ताओ हवंति काओ वि॥1006॥
सर्व गुणों से भूषित मुनि अरु पुरुषों में जो श्रेष्ठ कहे ।
चरम शरीरी नर को देतीं जन्म कई नारियाँ अरे॥1006॥
अन्वयार्थ : लोक में कितनी शीलवंतियों को शील के प्रभाव से प्रबल जल बहाने में समर्थ नहीं होता; प्रज्वलित हुई घोर अग्नि भी दग्ध नहीं कर सकती, सर्प तथा सिंह-व्याघ्रादि दुष्ट जीव तो दूर से ही छोड जाते हैं, ऐसी भी स्त्रियाँ हैं ही और जो सर्व गुण समूह के धारक साधु, उनकी तथा पुरुषों में प्रधान चरम शरीरी, उनकी मातापने को प्राप्त करने वाली कितनी ही स्त्रियाँ जगत में होती ही हैं ।
सदासुखदासजी