
दट्ठुं विहिंसणीयं अमेज्झमिव संकुदो पुणो होज्ज ।
ओज्जिग्घिदुमालद्धुं परिभोत्तुं चावि तं बीयं॥1011॥
दट्ठुं ेवहिंसणीयं अमज्झिेमव संकुदाि िुणाि हाज्जि ।
आिज्जिग्घिदुमालद्धुं पिरभात्तिुं चोव तं बीयं॥1011॥
अन्वयार्थ : जो देखते ही विष्टा के समान ग्लानि के योग्य है, ऐसा माता का मलिन रुधिर, पिता का वीर्य है, उसे सूँघने को, आलिंगन करने को और भोगने को कैसे समर्थ होते हैं?
सदासुखदासजी