समिदकदो घदपुण्णो सुज्झदि सुद्धत्तणेण समिदस्स ।
असुचिम्मि तम्मि बीए कह देहो सो हवे सुद्धो॥1012॥
समिद1 शुद्ध है इसीलिए उससे निर्मित घेवर भी शुद्ध ।
लेकिन जिसका बीज मलिन है वह शरीर कैसे हो शुद्ध॥1012॥
अन्वयार्थ : जैसे समित/गेहूँ की कणिका का बनाया घेवर तो गेहूँ की कणिका/मेंदा की शुद्धता से घेवर भी शुद्ध ही होता है और माता के अशुचि रूप रुधिर और पिता के वीर्य से उत्पन्न यह देह शुद्ध कैसे होगी? मलिन से उत्पन्न महामलिन ही होता है । ऐसा तो देह का बीज कहा ।

  सदासुखदासजी