पं-सदासुखदासजी
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अब शरीर की उत्पत्ति क्रम का पाँच गाथाओं में निरूपण करते हैं-
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कललगदं दसरत्तं अच्छदि कलुसीकदं च दसरत्तं ।
थिरभूदं दसरत्तं अच्छदि गब्भम्मि तं बीयं॥1013॥
मात गर्भ में यह शरीर दस निशि तक रहे प्रवाहीरूप ।
रहे कालिमामय दस निशि तक दस निशि रहता है थिररूप॥1013॥
सदासुखदासजी