पं-सदासुखदासजी
तत्तो मासं बुब्बुदभूदं अच्छदि पुणो वि घणभूदं ।
जायदि मासेण तदो मंसप्पेसी य मासेण॥1014॥
तदनन्तर वह एक माह तक रहता है बुलबुले स्वरूप ।
पुनः मास इक हो कठोर फिर एक माह तक पिण्ड स्वरूप॥1014॥
सदासुखदासजी