पं-सदासुखदासजी
मासेण पंच पुलगा तत्तो हुंति हु पुणोवि मासेण ।
अंगाणि उवंगाणि णरस्स जायंति गब्भम्मि॥1015॥
मास पंचमे में बनते हैं हाथ पैर सिर के अंकुर ।
छठे मास में बन जाते हैं अंग और उपांग जरूर॥1015॥
सदासुखदासजी