पं-सदासुखदासजी
जदि दाव विहिंसज्जइ वत्थीए मुहं परस्स आलेट्टुं ।
कह सो विहिंसणिज्जो ण होज्ज सल्लीढपोट्टमुहो॥1027॥
जेद दाव ेवहिंसज्जइ वत्थीए मुहं रिस्स आलट्टिुं ।
कह साि ेवहिंसेणज्जाि ण हाज्जि सल्लीढिाट्टिमुहाि॥1027॥
सदासुखदासजी