पं-सदासुखदासजी
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अब शरीर की वृद्धि को चार गाथाओं में कहते हैं -
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बालो विहिंसणिज्जाणि कुणदि तह चेव लज्जणिज्जाणि ।
मेज्झामेज्झं कज्जाकज्जं किंचिवि अयाणंतो॥1028॥
कार्य-अकार्य अशुचि-शुचि के अन्तर का नहिं बालक को ज्ञान ।
निन्दा-योग्य तथा लज्जा के योग्य कार्य वह करे अजान॥1028॥
सदासुखदासजी