पं-सदासुखदासजी
अण्णस्स अप्पणो वा सिंहाणयखेलमुत्तपुरिसाणि ।
चम्मट्ठिवसापूयादीणि य तुंडे सगे छुभदि॥1029॥
अपना अथवा अन्य जनों का मूत्र चर्म हड्डी विष्टा ।
चर्बी कफ अरु वीर्य आदि को अपने मुख में रख लेता॥1029॥
सदासुखदासजी