पं-सदासुखदासजी
जं किं चि खादि जं किं चि कुणदि जं किं जंपदि अलज्जो ।
जं किं चि जत्थ तत्थ वि वोसरदि अयाणगो वालो॥1030॥
चाहे कुछ भी खाए, कुछ भी करे, लाज तजकर बोले ।
अपवित्र हो या पवित्र स्थल में वह मल-मूत्र तजे॥1030॥
सदासुखदासजी