बालत्तणे कदं सव्वमेव जदि णाम संभरिज्ज तदो ।
अप्याणम्मि वि गच्छे णिव्वेदं किं पुण परंभि॥1031॥
यदि बचपन में किये गये अपने कायाब को याद करें ।
बात दूसरों की क्या करना अपने प्रति वैराग्य जगे॥1031॥
अन्वयार्थ : इस मनुष्य ने बाल्य-अवस्था में "यह वस्तु शुचि है, यह अशुचि है तथा यह कार्य करने योग्य है, यह कार्य करने योग्य नहीं है," - ऐसा रंचमात्र भी नहीं जानता था । महानिंद्य ग्लानि योग्य कर्म किये हैं और महा लज्जनीय कर्म किये हैं । बाल्य-अवस्था में क्या-क्या निंद्यकर्म किये, वही कहते हैं - दूसरों तथा स्वयं की नासिका का मल, कफ, मूत्र, विष्ठा, चाम, हाड, नसां तथा राधि इत्यादि महानिंद्य वस्तुएँ अपने मुख में डाली हैं । बाल्य-अवस्था में अज्ञानी बालक ने खाद्य- अखाद्य खाया है, बोलने योग्य या अयोग्य वचन बोले हैं । योग्य तथा अयोग्य के ज्ञानरहित कार्य अकार्य किये हैं ओैर निर्लज्ज होकर जहाँ-तहाँ शुचि-अशुचि स्थान में मल-मूत्र किया है । अधिक कहाँ तक कहें? जो बाल्यपने में स्वयं ने जो सब कुछ किया, उसका यदि स्मरण भी करे तो वैराग्य को प्राप्त हो जाये । पर में वर्तता है, उसका तो क्या कहना! ऐसी देह की वृद्धि में अशुचिता दिखलाई ।

  सदासुखदासजी