एवं सव्वे देहम्मि अवयवा कुणिमपुग्गला चेव ।
एक्कं पि णत्थि अंगं पूयं सूचियं च जं होज्ज॥1043॥
इसप्रकार इस तन के सब अवयव हैं पुद्गल अशुचि स्वरूप ।
नहीं एक भी अवयव एेसा जो पवित्र अरु सुन्दर रूप॥1043॥
अन्वयार्थ : इस देह में ऐसा एक भी अंग नहीं है, जो पवित्र हो-शुचि हो, समस्त अशुचि ही हैं ।

  सदासुखदासजी