जदि होज्ज मच्छियापत्तसरसियाए तयाए णो थगिदं ।
को णाम कुणिमभरियं सरीरमालद्धुमिच्छेज्ज॥1044॥
यदि मक्खी के पंख समान त्वचा तन पर नहिं लिपटी हो ।
तो मल से भरे शरीर को छूना कौन पसन्द करे॥1044॥
अन्वयार्थ : जो इस देह में मक्खी के पंख समान भी त्वचा/चाम, उससे आच्छादित/ढकी न हो तो मलिन मांस-रुधिरादि से भरा यह शरीर, इसे स्पर्शन/छूने की कौन इच्छा करेगा?

  सदासुखदासजी