
परिदड्ढसव्वचम्मं पंडुरगत्तं मुयंतवणरसियं ।
सुट्ठु वि दइदं महिलं दट्ठुंपि णरो ण इच्छेज्ज॥1045॥
चमड़ी जल जाने से जिसका सारा तन हो गया सफेद ।
पीप बहे एेसी अतिप्रिय भी नारी को नर सके न देख॥1045॥
अन्वयार्थ : यदि देह की सम्पूर्ण चमडी दग्ध हो जाये और सफेद शरीर निकल आये, घावों में से रस-पीवादि झरने लग जायें तो मनुष्य अति प्रिय स्त्री को भी देखने की इच्छा तक नहीं करता । इसप्रकार तेरह गाथाओं में शरीर के अत्यन्त अशुचि अवयवों को दिखाया ।
सदासुखदासजी