पं-सदासुखदासजी
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अब देह से मैल निकलता है । यह तीन गाथाओं में कहते हैं-
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कण्णेसु कण्णगूधो जायदि अच्छीसु चिक्कणंसूणि ।
णासागूधो सिंधाणयं च णासापुडेसु तहा॥1046॥
बहे कान-मल कानों से आँखों से भी मल अरु आँसू ।
तथा नाक में रहे नाक-मल और सिंघाड़े रहते हैं॥1046॥
सदासुखदासजी